Tuesday, 17 September 2013

यादें……जो दिल को गुदगुदाती है तो कभी रुलाती है

कभी तुम नजर आए नहीं .....
निगाहे ढूंढती रही हर गली हर मोहल्ला ,,
कभी तुम चेहरा दिखाए नहीं ......
सूने दिल की गलियों में बिछाने को उजाला।
यू तो सहन मेरा भी धूप से भरा था ...
पर कहीं गुलमोहर तो कहीं कचनार से उलझा पड़ा था।
कोई सफ़र आगाज करता, कि ...
वहां से नाता तोड़ गया।
खुद अपने ही गलियों को छोड़ गया।
बंदिशे तो थी , अजनबी शहर में .....
मेरी तन्हाई पर वो मुस्कुराते रहे .......
मै बहुत दूर तक यूं ही चलता रहा ,,
वो बहुत दूर तक याद आते रहे।

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